_____शामसंध्या______


आखरी पन्नोपे शायद कुछ लिख रहा है आसमा
की तयाच्या डोळ्यांवरी जणु पाखरे, झाली जमा

आसमंताच्या तळाशी अशात खळबळ होते पाणी
उससे जल जाते ये पन्ने, पन्नो की तेरी कहानी

जल रही शाम आखिर जलता हुआ उसका ये तन
केशरी श्रुंगार मखमल उरी वाजवी हलकेच पैंजण

ऋण-झुण हे इशारे पुन्हा, का कशाला याच प्रहरी ?
तेरी भी थी कुछ वो बाते इससे हलकी, इससे गहरी

तब बुझी ती शाम शायद, तब जरासा था धुंआ
त्याचवेळी घात झाला अन नेमकी विझली हवा

त्या धुक्याच्या पार होता या अक्षरांचाच आत्मा
आखरी पन्नोपे शायद कुछ लिख रहा है आसमा

—एस. के. [ पन्नो की ये तेरी कहानी ]

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